Saturday, 10 August 2013

शरारत प्यार में करेंगे

It used to be
That when I would wake in the morning
I could with confidence say,

‘What am ‘I’ going to

That was before the seed
Cracked open.

Now Hafiz is certain:
There are two of us housed
In this body,
Doing the shopping together in the market and

Tickling each other
While fixing the evening’s food.

Now when I awake
All the internal instruments play the same music:

‘God, what love-mischief can ‘We’ do
For the world
होता था ऐसा अक्सर ,

जागता था जब सुबह , 
कह सकता था विशवास से , 
"क्या करने जा रहा हूँ ?" 
ऐसा  था जब तक नहीं फूटा था बीज। 
जानता है अब यह हाफ़िज़ : 
दो हैं हम रहते जो इस देह में ,
 करते खरीदारी बाज़ार में और 
गुदगुदाते एक दूजे को , 
तय करते शाम का भोजन जब। 
जागता हूँ अब मैं  
वाद्य उर के बजाते एक स्वर ;
ओ खुदाया , कौन सी शरारत प्यार में  करेंगे
 जहाँ के लिए 
आज हम ?
~ Hafiz 

No comments:

Post a Comment